मन की ढेर सारी कल्पनायें, थोड़ा थोड़ा यकीन औऱ सरहद पार होने पर बहुत बडी रेगिस्तान सी पसरी वीरान ,बंजर मरूभूमि पर आज बीज बो दिए हैं, नन्हें पौधें जब सीना तान एक सुंदर वाटिका का निर्माण करेंगे तो निश्चित ही एक देवीय वातावरण संसार में निर्मलता भर देगा……..

उम्मीद

पंख से लग जाते हैं …
जब चुपके से , कान में कह जाती है
इक उम्मीद की किरन…
कि कल के मेले में, उसकी मां भी आ रही हैं ..
माँ से मिलते ही, हँसती खिलखिलाती
पर अंतस में सूख रहे अपने वजूद को
माँ का प्यार से, चिरकाल तक भिगोना चाहती हैं ,
और माँ भी उन आंखों में ढूंढती है
भीड़ में गुम, अपनी उस बच्ची को
जो अपने हाथों से खीचती हुईं
उसे दुकानों तक ले जाती थी,
माँ साथ लायी सौगातों में
समेटना चाहती हैं उसका संसार
मेले में खरीदना चाहती है,
उसकी खुशियां अपार…
और वो, मेले से इतर
बस थामे रहना चाहती हैं
मजबूती से, माँ का आँचल
अगले मेले के आ जाने तक …..

_ दमयन्ती परंडियाल